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: यदि मन की बिगडेगी प्रकृति, तो निश्चित आएगी विकृति : प्रकाशमुनिजी म.सा

admin

Wed, Apr 26, 2023

रतलाम 25 अप्रैल। आजकल लोग कहते है कि प्रकृति बिगड गई है। कभी भी गर्मी हो जाती है, कभी भी बारिश हो जाती है, लेकिन इसमें प्रकृति का दोष नहीं है। हमारी आत्मा की प्रकृति बिगडी, तो संसार की प्रकृति बिगडी है। व्यक्ति को उसका मन जिस दिशा में ले जाता है, वह वैसा ही सोचने और करने लगता है। मन की प्रकृति बिगडती है, तभी विकृति आएगी।

यह बात श्रमण संघीय प्रवर्तक श्री प्रकाशमुनिजी मसा ने नोलाइपुरा स्थित श्री धर्मदास जैन मित्र मंडल स्थानक में व्याख्यान के दौरान कही। अनुचित पथ विषय पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि प्रकृति में आए बदलावांे के लिए मनुष्य स्वयं ही दोषी है। यदि हम प्रकृति रहते, तो प्रकृति सदैव हमारे साथ रहती, लेकिन व्यक्ति अपने मन के अधीन हो गया। इससे मन जो कहता है, वही उसे करना होता है और इससे विकृतियां बढती जा रही है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आत्मा की प्रकृति में जीना चाहिए, क्योंकि प्रकृति में जीने वाला कभी दुखी नहीं होता, वह सदैव प्रसन्न रहता है। सब यह विचार करे कि सडक पर करोडों की गाडी में जाने वाला अधिक प्रसन्न है अथवा पैदल विहार करने वाले संतों की प्रसन्नता अधिक है।

प्रवर्तकश्री ने कहा कि संतों का चित्त प्रकृति के साथ रहता है, जबकि अन्य लोगों का चित्त मन और व्यक्ति के अधीन है। संसार में हमेशा शरीर ही थकता है, मन कभी नहीं थकता। यदि हमारे चित्त की प्रसन्नता हमारे हाथ में नहीं है, तो उसके लिए हम स्वयं दोषी है। हमने अपने मन को दूसरों अधीन कर दिया हैं प्रवर्तकश्री ने प्रसन्न रहने के लिए प्रकृति के साथ चलने का आव्हान किया। आरंभ में महासती श्री रमणीक कुंवर रंजन की मसा ने विचार रखे। इस दौरान पंडित रत्न श्री महेन्द्र मुनिजी मसा, श्री दर्शनमुनिजी मसा, श्री अभिनंदन मुनि जी मसा,एवं महासती श्री चंदनबाला जी मसा, श्री कल्पनाश्रीजी मसा, श्री चंदना जी मसा, श्री लाभोदया जी मसा, श्री जिज्ञासा जी मसा आदि ठाणा उपस्थित रहे। संचालन रखब चत्तर ने किया। प्रभावना का वितरण चंदनमल, राजमल मूणत परिवार द्वारा किया गया।

अभिग्रहधारी और उग्रविहारी का विहार : वर्षीतप पारणा महोत्सव संपन्न होने के बाद अभिग्रहधारी एवं उग्र विहारी श्री राजेशमुनिजी मसा ने सेवाभावी श्री राजेन्द्रमुनिजी मसा के साथ मंगलवार सुबह रतलाम से विहार कर दिया। वे उग्र विहार करते हुए बिलपांक तक पहुंच गए। गुरूभक्तों ने जय-जयकार करते हुए उन्हें बिदाई दी।

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